परम श्रद्धेय बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने संविधान के माध्यम से आर्थिक, सामाजिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए निःशुल्क न्याय के समान अवसर देने की बात कही है। लेकिन वर्तमान समय में ये देखा गया है कि आर्थिक रूप से कमजोर होने की वजह से तमाम लोग निर्दोष होते हुए भी स्वयं को साबित नहीं कर पाते। तमाम निर्दोष इसलिए जेल की हवा खा रहे हैं। ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) सबको निःशुल्क न्याय की वकालत करती है और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए जमीन पर ये सुनिश्चित हो, इसके लिए प्रयास कर रही है। संविधान का अनुच्छेद 39A कहता है, राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक तंत्र इस प्रकार काम करे, जिससे समान अवसर के आधार पर न्याय सुलभ हो और विशिष्टतया यह सुनिश्चित करने के लिये कि आर्थिक या किसी अन्य निर्योग्यता के कारण कोई नागरिक न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न रह जाए। अनुच्छेद 14 और 22(1) भी राज्य के लिये कानून के समक्ष समानता और सभी के लिये समान अवसर के आधार पर न्याय को बढ़ावा देने वाली कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना अनिवार्य बनाते हैं।
निःशुल्क कानूनी सेवाएँ प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संस्थाएँ
निःशुल्क कानूनी सेवाएँ प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर तमाम संस्थाएँ हैं, जो क़ानूनी सहायता प्रदान करती है लेकिन लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। इसी को लेकर आरपीआई बड़े स्तर पर जागरूकता जगाने का काम करेगी।
राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA)- इसका गठन कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत किया गया था। भारत का मुख्य न्यायाधीश इसका मुख्य संरक्षक है।
राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (राज्य स्तर) – इसकी अध्यक्षता राज्य उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश करता है, जो इसका मुख्य संरक्षक है।
ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (जिला स्तर) – ज़िले का ज़िला न्यायाधीश इसका पदेन अध्यक्ष होता है।
तालुका/उप-मंडल विधिक सेवा समिति (तालुका/उप-मंडल स्तर) – इसकी अध्यक्षता एक वरिष्ठ सिविल जज करता है।
उच्च न्यायालय कानूनी सेवा समिति (उच्च न्यायालय)
सर्वोच्च न्यायालय: सर्वोच्च न्यायालय कानूनी सेवा समिति।
निःशुल्क कानूनी सेवाएँ प्राप्त करने के लिये पात्र व्यक्ति
महिलाएँ और बच्चे
अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के सदस्य
औद्योगिक कामगार
सामूहिक आपदा, हिंसा, बाढ़, सूखा, भूकंप, औद्योगिक आपदा के शिकार।
दिव्यांग व्यक्ति
हिरासत में उपस्थित वे व्यक्ति जिनकी वार्षिक आय संबंधित राज्य सरकार द्वारा निर्धारित राशि से कम है, अगर मामला सर्वोच्च न्यायालय से पहले किसी अन्य अदालत के समक्ष है और यदि मामला 5 लाख रुपए से कम का है तो वह सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष जाएगा।